Palitana 5 Chaityavandan In Hindi Full ((install)) Jun 2026
तीसरा चैत्यवंदन 'रायण पगलिये' नामक स्थान पर किया जाता है। प्रार्थना: "आदि जिनेश्वर रायना, छे पगला मनोहार, भाव सहित भक्ति करे, पहोंचाडे भवपार... रायण रुख तळे बिराजी, दीओ जगने संदेश, भवियण भावे..."। मान्यता है कि स्वयं भगवान ऋषभदेव ने इसी स्थान पर पहले पगलियां (पगलियाँ – पैरों के निशान) छोड़े थे। इसलिए यह स्थान अत्यंत पवित्र माना जाता है और यहां का चैत्यवंदन मोक्ष के निकट पहुंचने का प्रतीक है।
इस विस्तृत लेख में पालिताना यात्रा में किए जाने वाले , उनका महत्व और विधि विस्तार से दी गई है।
प्रस्तुत लेख में पालीताणा के पाँच चैत्यवंदन की संपूर्ण जानकारी, उनके मंत्र और विधि को विस्तार से प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। जैन धर्म के अनुयायियों के लिए यह जानकारी अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी। इस लेख को साझा करें ताकि अधिक से अधिक लोग इस पवित्र विधि से परिचित हो सकें और लाभान्वित हो सकें।
"शांति जिनेश्वर सुमिरिये, जेनी अचिरा माय,विश्वसेन कुल उपन्यो, मृग लांछन पाय।" palitana 5 chaityavandan in hindi full
यात्रा करते समय मौन रहना या केवल धार्मिक भजन गाना उत्तम है।
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पालीताणा के पाँच चैत्यवंदन जैन धर्म की समृद्ध परंपरा और आध्यात्मिकता के अद्वितीय उदाहरण हैं। ये केवल औपचारिक अनुष्ठान नहीं हैं, बल्कि आत्मशुद्धि, अहिंसा और क्षमा जैसे गुणों को विकसित करने का एक सशक्त माध्यम हैं। इस विधि के माध्यम से भक्त अपने कर्मों का क्षय कर आत्म कल्याण का मार्ग प्रशस्त करते हैं। छे पगला मनोहार
यह चैत्यवंदन भगवान आदिनाथ के प्रथम गणधर (मुख्य शिष्य) पुंडरीक स्वामी को समर्पित है, जिन्हें शत्रुंजय पर्वत पर ही मोक्ष की प्राप्ति हुई थी।
इस वंदन में श्रद्धालु व्रत लेता है- "आज पूरे दिन मैं बोलूंगा तो केवल प्रभु का नाम, खाऊंगा तो संयम से, और सोचूंगा तो केवल आत्मा की शुद्धि।"
अब यात्री (चारों दिशाओं में मुख वाला अद्भुत मंदिर) के पास पहुँचता है। यहाँ चौथी चैत्यवंदन का विधान है। भाव सहित भक्ति करे
इन पाँच स्थानों का चैत्यवंदन करके तीर्थयात्री न केवल अपने पापों का नाश करते हैं, बल्कि वे के पथ पर भी अग्रसर होते हैं। यह यात्रा उन्हें सांसारिक बंधनों से मुक्ति और आत्मा के शाश्वत स्वरूप को पहचानने का अवसर प्रदान करती है।
आदिदेव अळवेसरो, विनीतानी राय;नाभिराय कुल मंडणो, मरुदेवा माय।पांचशे धनुषनी देहडी, प्रभुजी परम दयाल;चोराशी लाख पूरवनी, जस आयु विशाल।वृषभ लांछन जिन वृषधरो, सेवे सुरनर कंत;'कीर्ति' करे जगमां वडी, ए तीरथ जयवंत।



